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राष्ट्रीय पुनर्जागरण के शिल्पी डा. हेडगेवार

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की अनेक महत्त्वपूर्ण स्मृतियों में एक अन्य घटना संवत्1946 शालिवाहन शाके 1811 को डा. केशव बलिराम हेडगेवार रूपी एक अद्वितीय एवं अनन्य शिशु ने जन्म लिया। कुछ वर्ष पूर्व उनके राष्ट्रव्यापी जन्म शताब्दी समारोहों तथा इस समय गत विजयादशमी से प्रारम्भ हुए राष्ट्रव्यापी जागरण अभियान से ही न केवल समूचा देश बल्कि अन्य देश भी उनके नाम से परिचित हुए है। इससे पूर्व इने-गिने लोगों ने ही उनका नाम सुना था और उससे भी कम लोग यह जानते थे कि उनका जीवन कैसा था और किस प्रकार उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गठन किया। किन्तु इसके विपरीत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सुपरिचित नाम है। इसके दो कारण है: एक तो उसकी दैनिक शाखाएँ लगती है और दूसरे देश के कोने-कोने में स्वयंसेवक असंख्य गतिविधियां चला रहे हैं। विदेशों जहां-जहां स्वयंसेवक पहुंचे हैं, रा.स्व.संघ का नाम फैला है। संघ कल्पना का उदय: डाॅ. हेडगेवार ज्वलन्त देशभक्ति से उद्दीप्त ज्योतिपुंज थे। वे दीर्घकाल तक स्वाधीनता आन्दोलन की अग्रिम पंक्ति में रहे- प्रारम्भ में क्रान्तिकारी और बाद में कांग्रेस में। जिस समय उन्होंने संघ के श्री गणेश का निश्चय किया, वह मध्य प्रान्त के चोटी के कांग्रेसी नेताओं में से एक थे। लेकिन एक बार जब वे इस निष्कर्ष पर पहंुचे कि दास बनाने वाले अंग्रेजों तथा धर्मान्ध मुस्लिम अलगाववाद की मिली-जुली चुनौती का सामना करने के लिए एक नितान्त भिन्न प्रकार का संगठन आवश्यक है, तो वे राजनीति तथा आन्दोलन के क्षेत्र से अलग हो गये और उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। तत्पश्चात् सन् 1930 में सत्याग्रह में भाग लेकर एक वर्ष का कारावास में रहने को छोड़कर सम्पूर्ण शक्ति से संघ के निर्माण में जुटे रहे। उनका उद्देश्य था कि प्रचार और प्रसिद्धि की चकाचैंध से दूर रहकर एक समरस, सशक्त तथा सुसंगठित इकाई के रूप में हिन्दू समाज का पुनर्गठन किया जाये। उन्होंने शाखाओं की श्रंखला के विस्तार और सुदृढ़ीकरण पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। दृष्टिकोण की इस नितान्त एवं निर्णायक भिन्नता के पीछे उनकी यह अडिग मूल आस्था थी कि केवल सुसंगठित तथा सशक्त हिन्दू समाज ही विश्वसनीय राष्ट्रीय शक्ति के रूप में ब्रिटिश-मुस्लिम गठबन्धन की चुनौती का सामना कर सकता है और देश की एकता तथा स्वाधीनता को बनाये रख सकता है। वास्तव में राष्ट्रीय पुनर्जागरण आन्दोलन की अग्रिम पंक्ति का प्रत्येक नेता भलीभांति इस कार्य की आवश्यकता अनुभव कर चुका था। तथापि, डा. हेडगेवार की संगठनात्मक प्रतिभा पर छोड़ दिया गया कि वे इस महान् स्वप्न को साकार करने की व्यावहारिक विद्या की संकल्पना करें। राष्ट्र-निर्माण की नींव: यह तथ्य है कि विगत 75 वर्षों में संघ ने जिस समर्थ संगठित हिन्दू शक्ति का निर्माण किया है, वह अब राष्ट्रीय प्रासाद के विशाल परकोटे के रूप में खड़ी है। और इस बात का जीवन्त प्रमाण है कि डा. हेडगेवार ने अचूक विद्या का विकास किया था। एक-दो बार नहीं बारम्बार संघ के लाखों स्वयंसेवक राष्ट्र की स्वाधीनता, सम्मान और अखण्डता की सुरक्षा हेतु जन-शक्ति को एकजुट करने के लिए ­प्रेरणा के चलते-फिरते स्रोत सिद्ध हुए हैं। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार हमारे देश की राजनैतिक तथा अन्य सम्बद्धताएं चाहे कुछ भी हों वह अब यह अनुभव करने लगा है कि रा.स्व.संघ के प्रतीक रूप में सजग पुनरूत्थानवादी हिन्दुत्व आज जीवन के हर क्षेत्र में राष्ट्र को राष्ट्रीय सत्प्रयास के उत्तुंग गौरव-शिखरांे की ओर ले जा रहा है। राष्ट्रीय पुनर्जागरण: इस सम्बन्ध में हिन्दू मान में संघ ने जो परिवर्तन किया है, वह वास्तव में श्लाघ्य है। जब संघ की स्थापना की गयी थी, तब सामान्य हिन्दू हताश था। वह स्वयं को नितान्त असहाय अनुभव करता था और संगठित तथा आत्मभिमानी सामाजिक इकाई के रूप में खड़े होने की इच्छा और विश्वास मर चुका था। बाध्य होकर गांधी जी को भी एक बार यह कहना पड़ा था कि सामान्य हिन्दू कायर है और मुसलमान गुंडा। किन्तु अब स्थिति ने वस्तुतः नितान्त नवीन रूप धारण कर लिया है। समूचे देश को आप्लावित करने वाली विराट् हिन्दू लहर इस आत्मविश्वास तथा गौरव के पुनर्जागरण का ही प्रतीक है जो हिन्दू धमनियों में प्रवाहित हो रहा है। इससे बढ़कर राष्ट्र सेवा और क्या हो सकती है कि उत्थान की उसकी इच्छा को पुनः जाग्रत कर दिया जाये और वह विजयोल्लास के साथ आगे बढ़ने लगे ? सत्ता-परिवर्तन पर्याप्त नहीं: डा. हेडगेवार का दूसरा प्रमुख योगदान उनकी यह सफलता थी कि उन्होंने स्वाधीनता की संकल्पना में सच्ची राष्ट्रीय भावना का पुट दिया। उन दिनों स्वाधीनता-संघर्ष के नेता वैचारिक दुविधा की भँवर में फंसे हुए थे। एक ओर संघर्ष की मांग थी कि जनशक्ति को एकजुट करने के लिए अत्यावश्यक तीव्र राष्ट्रवाद की भावना को जाग्रत किया जाये तो दूसरी ओर मुस्लिमों को मनाकर संघर्ष की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रश्न था। अंग्रेज अपनी ओर से ”सत्ता-हस्तान्तरण“ का प्रलोभन बारम्बार इस शर्त पर दे रहे थे कि उससे पूर्व ही राष्ट्रवादी नेता मुस्लिमों के साथ समझौता कर लें। जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे मुस्लिम लीग के धर्मान्ध तथा सम्प्रदायवादी नेतृत्व की मनुहार के प्रयासों का पलड़ा भारी होता गया। राष्ट्रीय आस्था और प्रेरणा के हर निष्कलुष आदर्श की विघटनकारी तथा सम्प्रदायवादी तत्वों के सम्मुख बलि चढ़ा दी गयी। हमारे नेताओं की एकमेव सर्वभक्षी लालसा बन गयी कि अंग्रेज भारत छोड़कर चले जायें और सत्ता भारतीयों के हाथों में आ जाये। समूचा कार्य एक ऐसा राजनीतिक सौदा बनकर रह गया जिसके अधीन राष्ट्र विघटनकारी शक्तियों तथा हमारे राष्ट्रीय नेताओं के बीच सत्ता का बंटवारा अपनी मातृभूमि का विखण्डन करने के सौदे के साथ पूरा हुआ। 1947 में विभाजन का भयंकर मूल्य चुकाने के बाद भी हमारे देश के राजनीतिक नेतृत्व का मानसिक ढाँचा ज्यों का त्यों रहा है। राष्ट्रीय जीवन के मंच के केन्द्र पर अब भी राजनीतिक सत्ता का प्रभुत्व बना हुआ है। जहां 1947 से पूर्व उद्देश्य स्वाधीनता प्राप्त करना था, वहां अब केवल यह उद्देश्य रह गया है कि अपने और अपने दल के लिए सत्ता हथिया ली जाये। किन्तु राजनीतिक नेतृत्व को अब भी इस मनोग्रन्थि ने जकड़ रखा है कि मुस्लिम समर्थन के बिना सत्ता प्राप्त नहीं की जा सकती और उसके कारण स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। समग्र रूप में राष्ट्रीय दल और राजनेता कट्टरपन्थी मुस्लिम तत्वों की चिरौरी करके उनकी पृथकतावादी तथा आक्रामकतावादी भूख को शान्त करते रहे हैं। इसके फलस्वरूप राष्ट्रवाद की सच्ची भावना से देश की राजनीति का विनाशकारी सम्बन्ध- विच्छेद होता रहा है। उसके कारण स्वयं हमारी स्वाधीनता ही दिशाहीन हो गयी है और उसका कोई उद्देश्य नहीं रह गया है। सांस्कृतिक-बोध आवश्यक: हमारी स्वाधीनता के अग्रदूतों और प्रणेताओं ने राजनैतिक स्वाधीनता की संकल्पना किसी अन्तिम लक्ष्य के रूप में नहीं की थी वरन् उन्होंने तो सोचा था कि वह राष्ट्र को उसकी प्राचीन विलक्षण प्रतिभा का चतुर्दिक विकास करने का अवसर प्रदान करेगी। किन्तु सच्चे राष्ट्रवाद के सूर्य को तो निरंकुश राजनीति के राहु-केतु ने ग्रस लिया है और उसके कारण भारत के हर क्षेत्र में अन्य राष्ट्रों की भोंडी नकल बन कर रह गया है। परिणाम हम सबके सामने है: लोगों के मुख-मण्डल से सच्ची स्वाधीनता का ओज पूर्णतया लुप्त हो गया है। जीवन के हर क्षेत्र में राजनीति की घुसपैंठ हो गयी है। समाचार-जगत में राजनेताओं की जोड़-तोड़ की चटपटी कहानियों की भरमार है। सभी का केन्द्र-बिन्दु है राजसत्ता। राजनेता लोगों से जो चिकने-चुपड़े वायदे करते हैं, वे भी बस अधिकाधिक आर्थिक प्रलोभनों के होते हैं। कहीं भी जीवन के उच्चतर मूल्यों का आह्वान नहीं होता। राजनेताओं में उच्च नैतिक स्वर में बोलने का साहस ही नहीं होता। जन-साधारण के सामने कोई उच्चतर राष्ट्रीय प्रयोजन नहीं रह गया है। वह भी अपनी-अपनी सीमित क्षमता के भीतर अवसर का पूरा-पूरा लाभ उठाने का प्रयास कर रहा है। उभरती पीढ़ी अर्थात् छात्र वर्ग भी इस पागलपन का शिकार हो गया है। डा. हेडगेवार ने राष्ट्रवाद के सारतत्व पर स्पष्टतः बल देकर राष्ट्र की जड़ों से राजनीति की वैचारिक विमुखता को समाप्त करने का प्रयास किया। उनका यह स्पष्ट मत था कि स्वाधीनता की पताका के तले हिन्दू आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संचेतना के अनुरूप राष्ट्रीय पुनः निर्माण के सभी पक्षों के बारे में मार्गदर्शी सिद्धान्त निश्चित किये जायें। उन्होंने कहा था कि केवल भौगोलिक इकाई को राष्ट्र नहीं कहा जा सकता। अब स्वाधीनता के आगमन के साथ स्वयंसेवकों के प्रयासों के कारण जीवन के सभी क्षेत्रों में ढेर सारी गतिविधियां होने लगी है और संगठन खड़े हो गये हैं। उन सभी ने उस रचनात्मक दर्शन से प्रेरणा ग्रहण की है। शिक्षा, श्रम, कृषि, समाज-सुधार आदि के विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे इन प्रयासों के वातावरण में हम भारत-भूमि की अन्तर्गत तथा जीवन दायिनी प्राणवायु का सेवन कर सकते हैं। व्यवस्था पहले या मनुष्य का निर्माण: डा. हेडगेवार का तीसरा अति महत्वपूर्ण योगदान ऐसा है जिसकी ओर सभी राष्ट्रों को भी ध्यान देना चाहिए। सम्पूर्ण विश्व मंे सरकार का ढाँचा चाहे कम्युनिस्ट हो या लोकतान्त्रिक, राज्य-सत्ता ही वह प्रमुख साधन है जिसे सम्बद्ध राष्ट्रों के भाग्य को संवारने की शक्ति प्रदान की जाती है। जहां कम्युनिस्ट व्यवस्था में सत्ता-संकेन्द्रण पूर्णतया निरंकुश होता है, वहां लोकतंत्र में जनता को उसमें सहभागी बनाया जाता है। किन्तु दोनों ही प्रणालियों में जन-मानस का नियमन आर्थिक होती है। किन्तु हिन्दू विचारधारा तथा परम्परा ने गौरवपूर्ण स्थान मानव को दिया है, सत्ता को नहीं। यहां साधारणतम से लेकर उच्चतम स्तर तक समाज के हर व्यक्ति के नैतिक सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक संस्कारों को सुदृढ़ करने पर पूर्ण बल दिया गया। स्वयंशासक को भी इस चरित्र निर्माण का कठोर प्रशिक्षण लेना पड़ता था। सर्वोच्च मानवीय मूल्यों के पल्लवन एवं प्रस्फुटन की इस परम्परा ने ही सहस्त्रों वर्षों तक हिन्दू राष्ट्र को सम्पूर्ण मानवता की सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक जननी होने का गौरव प्रदान किया। स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में ”मानव-निर्माण“ का यह कठिन कार्य ऐसा नहीं है कि जिसे सम्पन्न करने की आशा सरकार से की जा सके। आर्थिक अथवा राजनैतिक सत्ता नहीं वरन् वास्तविक जीवन में समाज-कल्याण हेतु स्वार्थ-त्याग, सेवाव्रत के ज्वलन्त उदाहरण तथा सर्वोच्च जीवन-मूल्य जो जनसाधारण को उसके भीतर उन्हीं गुणों को प्रतिष्ठित करने की प्रेरणा दे सकते हैं। समाज में सर्वाधिक दीन-हीन के लिए न्याय, सुख तथा स्वाधीनता सुनिश्चित करने की सबसे पक्की गारन्टी वस्तुतः ऐसी परिस्थितियों में ही दी जा सकती है जहां जीवन के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक आदि हर क्षेत्र का नियमन, सर्वाधिक उदात्त सामाजिक तथा आध्यात्मिक उमंगों से अनुप्राणित मानव करेंगे। गांधी जी संघ-शिविर में: क्या कारण था कि डा. हेडगेवार स्वयं राजनीति के मंच से चुपचाप हट गये और चरित्र-निर्माण के कठोर कार्य में में जुट गये ? इसका उत्तर इस तथ्य में निहित है कि राष्ट्र के भौतिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्रों में सच्चे राष्ट्रीय पुनर्जागरण के बारे में इस मूल दृष्टिकोण और कार्य पद्धति की उनकी स्पष्ट कल्पना थी। 1934 में जब गांधी जी वर्धा में संघ का युवक-शिविर देखने गये थे तो बाद में उन्होंने स्वयं कहा था कि स्वयंसेवकों के अनुशासन, कठोर श्रम, सामाजिक समता तथा आदर्शवाद की भावना का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा था। बाद में जब डा. हेडगेवार से गांधी जी की भेंट हुई तो उन्होंने हेडगेवार से पूछा कि किस कारण उन्होंने कांगे्रस में रहते हुए वालिंटियर संगठन खड़ा करने के स्थान पर एक नये वालिंटियर संगठन की स्थापना का निश्चय किया और यह भी कि कहीं पैसे की कमी तो उनके कार्य में बाधक नही बन रही ? डा. हेडगेवार ने उत्तर दिया कि ‘स्वयंसेवक’ सम्बन्धी उनकी संकल्पना राजनीतिक दल के अधीन काम करने वाले वालिंटियर से मूलतः भिन्न थी। उन्होंने कहा कि संघ स्वयंसेवक ढालने का प्रयास कर रहा है जिनमें राष्ट्र के कल्याण के लिए निःस्वार्थ सेवा के संस्कार कूट-कूट कर भरे हों और जो किसी भी प्रकार के प्रतिदान की आशा न करें। नाम और दाम से भला उन्हें क्या काम ? ‘सत्ता’ के द्वारा नहीं बल्कि ‘मानव’ के द्वारा राष्ट्रीय पुनर्जागरण के इस महान् स्वप्न को साकार करने में डा. हेडगेवार ने जो अनोखी सफलता प्राप्त की, वह अब सर्वत्र दृष्टिगोचर हो रही है। जिस शाखा की विधा को उन्होंने विकसित किया, वह ऐसे सेवाव्रती आदर्शवादियों के लालन-पालन का अति सक्रिय तथा सृजनात्मक केन्द्र बनी हुई है जो हमारे राष्ट्रीय जीवन के हर क्षेत्र में निःस्वार्थ सेवा, चरित्र, अनुशासन तथा विशुद्ध राष्ट्रीय आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता की स्वच्छ वायु का संचार कर रहे हैं। ऐसे जीवन-मूल्यों तथा सद्गुणों के प्रति, जिनके लिए हमारा अति प्राचीन तथा महान् भारतवर्ष सर्वत्र विख्यात है, तेजी से पनपता हुआ चतुर्दिक आग्रह, आशा तथा विश्वास के चिर आलोकित प्रकाश स्तम्भ के रूप में उसके महान् उज्ज्वल भविष्य का द्योतक है। संक्षेप में आधुनिक भारत में राष्ट्रीय पुनर्जागरण लाने में डा. हेडगेवार की विशिष्ट भूमिका रही है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, उनके विचार तथा प्रयास और अधिक सार्थक एवं मुखर होते जा रहे हैं। उनके जीवन का ज्वलन्त उदाहरण अधिकाधिक नर-नारियों को यह प्रेरणा देता रहा है कि वे उस पथ का अनुसरण करें जो उन्होंने राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत दर्शन को साकार रूप देने के लिए धर्मयोद्धा जैसी अटूट लगन से प्रशस्त किया है। ”मुझे स्वामी विवेकानन्द की महानता का बोध उनकी लिखी रचनाओं द्वारा हुआ, गांधी जी की महानता का बोध उनसे भेंट करने पर हुआ, डा. हेडगेवार से मैंने न तो भेंट की थी और न ही उनकी पुस्तकें पढ़ी थी, उनकी महानता की अनुभूति मुझे संघ के कार्यकताओं को देखकर हुई।“ एक तमिल विचारक का यह कथन तत्वबोधक है। भला डा. हेडगेवार के जीवन और ध्येय का इससे अधिक सशक्त तथा सुस्पष्ट मूल्यांकन और क्या हो सकता है। ”मैं अपनी इस मातृभूमि को अपनी माता समझता हूं। जब माता संकट में हो तब भला उसके पुत्रों को क्या करना चाहिए। यह भावना मेरी नस-नस में बल्कि हड्डी के कण-कण में समायी है। परमात्मा ने इस महाव्रत के लिए इस जगत में मुझे भेजा है।“ श्री अरविन्द।